तुमने तो कह दिया कि मुहब्बत नही मिली,
मुणको तो ये भी कहने की मुहलत नही मिली।
नीदों के देश जाते , कई ख्वाब देखते,
हमको दिया जलाने से ही फुर्सत नही मिली।
मुझको तो खैर, शहर के लोगों का खौफ था,
मुझको खुद अपने घर से इजाजत नही मिली।
बेजार यूे हुए कि तेरे ख्याल में हमें,
सब कुछ मिला, सकून की दौलत नही मिली।
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घटा अंबर पे फिर आई, बुझाए प्यास वो किसकी,
किसी का जिस्म प्यासा है,किसी की रूह प्यासी है
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बहुत मशरूफ है मौसम,उजड़ती बस्तियां जातीं,
उधर तूफान का जल्वा, जिधर ये किश्तियां जांतीं।
यहा कंक्रीट के बन में ,बहुत सी ऐसी गुफांए हैं,
नही फिर लौटकर आतीं, उधर जो तित्लियां जातीं।
जुबां से कह दियाा होंता, बुरा लगता नही शायद,
जो आंखों से कहा, दिल से उतरतीं बिजलियां जातींं।
सवालों में उलझकर जो रहे , तो उम्र मकतब में ,
जवांबों के लिए उनको ं, यहां दी कुर्सियां जांतीं।
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