Tuesday, 24 December 2024

अमृता_इमरोज

 #अमृता_के_इमरोज 97 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गये, अमृता जी की मृत्यु के लगभग 18 साल बाद। इमरोज के नाम के आगे लिखी तमाम उपमाएं उनके किरदार के आगे छोटी पड़ जाती हैं। इमरोज एक निःस्वार्थ प्रेमी थे वह जानते थे कि जिस लड़की पर वह दुनिया लुटा रहे हैं उसकी जिंदगी में कोई और (साहिर) है  । फिर भी इमरोज जिंदगी भर एक ऐसे प्रेमी बने रहे जो इस बात से वाकिफ थे कि उनकी प्रेमिका तो किसी और से प्रेम करती है कितना मुश्किल होता होगा यह जानते हुये भी किसी को प्रेम करते रहना शायद इसी का नाम इश्क़ है। ऐसा ही इश्क़ इमरोज ने अमृता से किया था।


एक इंटरव्यू में इमरोज बताते हैं कि अमृता की उंगलियां हमेशा कुछ न कुछ लिखा ही करती हैं फिर चाहे उनके हाथों में कलम हो या न हो, बहुत बार मैं स्कूटर चलता और अमृता पीछे बैठ कर मेरी पीठ पर कुछ लिखा करती हैं जो मुझे पता होता हैं कि साहिर का नाम लिखती, लेकिन क्या फर्क पड़ता है अमृता साहिर को चाहती हैं और मैं अमृता को। 2005 में अमृता ने जब इमरोज की बाहों में दम तोडा़ तो इमरोज ने लिखा- हम जीते हैं, ताकि हमें प्यार करना आ जाये, हम प्यार करते हैं ताकि हमें जीना आ जाये ' उसने सिर्फ जिश्म छोडा़ है मेरा साथ नहीं '। 


अमृता और इमरोज लगभग 40 की उम्र में तब मिले जब अमृता को साहिर के नाम अंतिम ख़त लिखकर उसमें स्कैच बनवाना था और फिर मिले तो क्या ही मिले कि अंतिम सांस तक एक साथ रहे। दोनों ने शादी नहीं किया और एक ही घर में दो अलग कमरों में रहते थे। अमृता ने लिखा था कि ' अजनबी तुम मुझे जिंदगी की शाम में क्यों मिले, मिलना था तो दोपहर में मिलते' तब साहिर का जवाब आता है कि ' तुम मेरी जिंदगी की खूबसूरत शाम ही सही लेकिन तुम ही मेरी सुबह, ही मेरी दोपहर और तुम ही मेरी शाम हो... 


जब अमृता और इमरोज साथ रहने का निर्णय किये तो अमृता ने इमरोज से कहा कि एक बार तुम पूरी दुनिया घूम आओ और फिर भी तुम अगर मुझे चुनोगे तो मैं तुम्हारा यहीं इंतजार करते हुये मिलूंगी। इस पर इमरोज उठते हैं और उसी कमरे का सात चक्कर लगाते हैं और कहते हैं घूम लिया दुनिया... बस मेरी दुनिया तुम्हीं तक है। अमृता को लिखना पसंद था वह देर रात तक लिखा करती थी और इमरोज उन्हें रातों को चाय बनाकर पिलाया करते ताकि अमृता को थकान ना महसूस हो। इमरोज अमृता को एक पल भी अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देना चाहते थे। जब अमृता राज्यसभा की सदस्य बनी तो सदन चलने भर उन्हें छोड़ने जाते और वहीं बाहर इंतज़ार करते, ज्यादातर लोगों ने उन्हें उनका ड्राइवर समझ लिया था लेकिन वह तो प्रेम में पागल इमरोज थे।


आज की मौजूदा पीढ़ी शायद ही इमरोज को उतना जानती हो लेकिन प्रेम में इमरोज बन पाना कितना मुश्किल रहा होगा। मैं जितना जान पाया हूं अमृता जी और इमरोज जी को उतने में मैं दावे से कह सकता हूँ कि अपने समय से काफी आगे के प्रेमी-प्रेमिका रहे हैं दोनों जबकि अमृता जी से इमरोज लगभग 7 साल छोटे थे फिर भी उन्होंने अपने रिश्ते को इतिहास में अमर कर दिया। आज मुहब्बत की दुनिया के सभी लोग इमरोज ( मूल नाम- इन्द्रजीत सिंह ) को नम आँखों से याद कर रहे। 


 पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि इमरोज आशा करता हूं आज आप अपनी अमृता के पास जाकर बेहद खुश होंगे। 💐💐


#अमृता_इमरोज❤

#मीमोरी


रमाकांत यादव जी की प्रोफाइल से 🙏🌼

Sunday, 22 August 2021

पसंद


वो कहते हैं  चौपालों पर आज नण अफसाने हैं,

सुनानाम बदले हैं  जेकिन किस्सेे वही पुराने हैं।/

अंधों की सत्ता में मिलती नहीं रेबडी उनको ही,

जो खुद अंधे हैं याअंधों से  उनके याराने हैं।

पगडंडी पर बिछी हुईं  हैं अपनी नजरे बरसों से,

लेकिन शै  वो नजर न आजी, जिसके हम दीवाने हैं।

फिर से अबकी बार दूर से ,सभाी बहारें  गुजर गईं,

किसे पता है मौसम कया− क्या अपने मन में ठानेे है। 

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न  हम सफर,न किसी हमनशीं से निकलेगा,

हमारे पांव को कांटा,हमी से निकलेगा ।

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तुम्हारी याद ने बेचैन, मुझको रात भर रखा,

कभी तकिया इधर रखा, कभी तकिया उधर रखा।

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जलों अरूणिमा, इस नगरी में कोई अपना रहा नही,

इस नगरी के आईनों में अब सब चेहरे अनजाने हैं।

 −−−−

नैनाअंतर आव तू,पलक झापिं तोहि लेहूं,

न मैं देखूें और को, तुणे न देखन देहूं। 

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चली गई है को ई श्यामा,

आख बचाकर नदी नहाकर,

कांप  रहा है, अब तक व्यकुल ,

विकल नील जल।

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इकलाचांद असंख्य तारें,

नील गगन के खुले किवाड़े।

को हमकों कहीं पुकारे ,

हम आंएगे , वाहं पसारे।

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नही फुरसत यकीं जानों, हमें कुछ और करने की,  

तेरी बाते, तेरी यादें,बहुत मशरूफ रखती हैं।

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हमने तमाम उम्र अकेले सफर किया।

हम पर किसी खुदा की इनायत नही रही।

हिम्मत से सच कहूं, तो बुरा मानते हैं,

रो− रो के बात करने की आदत नही रही। 

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लिखी गईं है, हमारे लहूं से ही सुर्खियां,

लेकिन हमी खबर से अलग कर दिये गए।

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दीवारों पर ही दसतक देते रहिए,

दीवारों से ही रस्ते निकलेंगे।

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सूफी − संत चले गए, सब जंगल की ओर,

मंदिर मशृजिद में मिलें,रंग , बिरंगे चोर।

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तुम्हारे शहर के सारे दिए तो  सो गए लेकिन,

हवा से पूछना ,  दहलीज पर ये कौन जलता है।  

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मेरे चेहरे पे वख्त की निशानियां हैं बहुत,

चख्त जहां ठहरा, सलबट सी पड़ गईं।

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लगा दो आग पानी में ,शरारत हे तो ऐसी हो,

मिटा  दो जुल्म की हस्ती, बगावत हो तो ऐसी हो।

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निकट दूर हों ,  जहां भाी अपने हों सानन्द,

यही मनाते देव से झूमें गाए छंद।

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ये कैंचियां क्या  खाकर काटेंगी पर हमारे,

हम परों से नहीं ,हौंसलों से उड़ान भरते हैं।

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तेार दुनिया का ये दस्तूर भी, अजब हैं खुदाया,

मुहब्बत उनको मिलती है, जिन्हें करनी नही आती।  

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गजल

पहले तो अपने आप से नजरें मिलाइये,

फिर चाहे हमपे शौक से तोहमत लगाइये।

 मेहनत की भट्टियों में झुलसना तो छोडि़ए,

रिश्तों की आंच में जरा तपकर दिखाईए।

औरत हूूं , आइना नही, जो टूट जाउंगी ,

इन पत्थरों से और किसी को डराइए।

बनना है गर अमीर तो बस इतना कीजिए,

जिस्मों की कच्र खोदके किडनी चुराइए।

अशआर तो होते ही, सुनाने के लिए हैं,

लेेकिन हया के साथ  इन्हें गुन गुनाइए ।

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बिना तेरे मुझे, धड़कन  थमी  महसूस होती है,

मेरी आंखखों में जाने क्यूं , नमी महसूस होती है।

तराना है, कहानी है, जमाना है, जवानी है,

मगर मगर भी मुझे तेरी, कमी महसूस होती है।

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कब कहता हूं मैं वेाअच्छा बहुुत है,

मगर उसने मुझे चाहा बहुत है।

खुदा इस शहर को महफूज रखे,

ये बचचों की तरह हंसता बहुुत है।  

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तू अगर इश्क में बरबाद नही हो सकता,

 जा तुझे कोई सबक , याद नही हो सकता।

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दिलों की  सांकले और जहन की कुंडियां खोलो,

बड़ी भारी घुटन है, द्वा्र खोलो,  खिड़कियां खोलो।

कसी मुट्ठी  को लेकर आए हो, गुससे में हो शायदा,

मिलाना है जो हमसे हाथ, तो ये मुट्ठियां खाेलो।

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करो न फिक्र, जरूरत पड़ी  तो हम देंगे,

जिगर का खून,चरागोां में डालने के लिए।

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बारिशाे के जोर से वो फिर जमी पर आ गए,,

वरन कुछ जर्रे जमी कें,आसमां बनने को थे।

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फूलों −फलों दुनियां मे सदा शाद रहो तुम,

दुनिया रहे आबाद और आबाद रहो तूम।

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जुगनुओं तुमने बहुत की है, बुराई मेरी,

छिड़ ना जाए कहीं, सूूरज से लडा़ई मेरी। 

मेरे होठों से कभी  दर्द न छलका मेरा,

मेरी आंखों को कभी नींद न आई मेरी।

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किसी के एक आंसू पर , हजारों ंदिल तड़पते हैं,

किसी का उम्र भर रोना, यूं ही बेकार जाताहै

−−−−

यूं दिल पे हरेक रात भारी रही,

रोशनी के लिए जंग जारी रही।

उनके परचम भले ही दिलो ंपर रहे, 

पर दिलों पर हुकूमत हमारी रही।

ये कैसी अनहोनी मालिक,ये कैसा संजोग।

कैसा−कैसी कुर्सियां ,कैसे − कैसे लोग।

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मुहब्बत में बुरी नीयत से कुछ साेचा नही जाता,

कहा जाता है उसको बेवफा,समणानही जाता।

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तूफान में कश्ती को किनारे भी मिलेंगे,

जहां में  लोगों को सहारे भी मिलेंगे।

दुनिया में सबसे प्यारी है  जिंदगी,

कुछ लोग जिंदगी से, प्यारे भी मिलेगे।  


 तुमने तो कह दिया कि मुहब्बत नही मिली,

मुणको तो ये भी कहने की मुहलत नही मिली।

नीदों के देश जाते , कई ख्वाब देखते,

हमको दिया जलाने से ही फुर्सत नही मिली।

मुझको तो खैर, शहर के लोगों का खौफ था,

 मुझको खुद अपने घर से इजाजत नही मिली।

बेजार यूे हुए कि तेरे ख्याल में हमें,

सब कुछ मिला, सकून की दौलत नही मिली।

−−− 

घटा अंबर पे फिर आई, बुझाए प्यास वो किसकी,

किसी का जिस्म प्यासा है,किसी की रूह प्यासी है 

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बहुत मशरूफ है मौसम,उजड़ती बस्तियां जातीं,

उधर तूफान का जल्वा, जिधर ये किश्तियां जांतीं।

यहा कंक्रीट  के बन में ,बहुत सी ऐसी गुफांए हैं,

नही फिर लौटकर आतीं, उधर जो तित्लियां जातीं।

जुबां से कह दियाा होंता, बुरा लगता नही शायद,

जो आंखों से कहा, दिल से उतरतीं बिजलियां जातींं।

सवालों  में उलझकर जो रहे , तो उम्र मकतब में ,

जवांबों के लिए उनको ं, यहां दी कुर्सियां जांतीं।

Saturday, 21 August 2021



 आके पड़ जाते हैं दिन भर के थके हारे लोग,
इनको गरीबों को ,फुटपाथ भी घर लगाता है।
वो ही फिर लाशाें की  गिनती, वहीं खूं के छींटे,
अब तो अखबार को छूते हुए, डर लगाता है।
−−−−−  

आपकी दृष्टि का जो परस  मिल गया ,
फूल की एक पांखुरी कमल बन गई ।
आपका हाथ छूकर मेरे हाथ में,
 भाग्य की ,एक रेखा अटल बन गई।
 शब्द की एक लड़ी जो रखी सामने ,
हो विदित आपको यह कला साधिके,
 आपके पग बंधे थे तो पायल रही,
 मेरे होठों पर आई गजल बन गई।
−−−−
भीड़ भीड़ बस भीड़ हर तरफ चेहरा कोई नहीं है 
हर पल है गतिमान निरंतर ठहरा कोई नहीं है ।
सिसके मानव की मानवता ,खड़ी बगल में पथ के, 
सुनता नहीं कोई भी सिसकी, बहरा कोई नहीं है।
−−
मेरी ख़ामोशी में भी फसाना ढूंढ लेती है 
बड़ी शातिर है ये  दुनिया बहाना ढूंढ लेती है ।
हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने का
 मगर आंख फिर भी सपना सुहाना ढूंढ लेती है ।
ना चिड़िया की कमाई है ,ना कारोबार है, कोई,
 वह केवल हौसलों से आाबोदाना ढूंढ लेती है ।
समझ पाई न दुनिया मस्त हल मंसूर का अब तक,
 जो सूली पर भी हंसना मुस्कुराना ढूंढ लेती है ।
उठाती है जो खतरा हर कदम पर डूब जाने का ,
वही कोशिश समंदर में खजाना ढूंढ लेती है।/
अपने साए से भी अश्कों को छुपा कर रोना जब भी रोना तो चिरागों को बूझकर रोना हाथ भी जाते हुए वह तो मिलकर ना गया मैंने चाहा था जिसे सीने से लगाकर रोना तेरे दीवाने का भी क्या हाल किया है हमने मुस्कुराते हुए लोगों को भी जाकर रोना लोग पढ़ लेते हैं चेहरे पर लिखी तब लिखें इतना दुश्वार है लोगों से छुपा कर रोना


 


तखलीफ़ मेरे ज़ख्मो की कुछ और बढ़ गई!
 मरहम लगा रहा है वह चाकू की नोक से !!
- Kishore Chaturvedi

वफ़ा की उम्मीद मत रखो इस दुनिया में, 
जब दुआ कबूल नहीं होती तो लोग भगवान बदल लेते हैं..
 vikash Sharma