Saturday, 21 August 2021



 आके पड़ जाते हैं दिन भर के थके हारे लोग,
इनको गरीबों को ,फुटपाथ भी घर लगाता है।
वो ही फिर लाशाें की  गिनती, वहीं खूं के छींटे,
अब तो अखबार को छूते हुए, डर लगाता है।
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आपकी दृष्टि का जो परस  मिल गया ,
फूल की एक पांखुरी कमल बन गई ।
आपका हाथ छूकर मेरे हाथ में,
 भाग्य की ,एक रेखा अटल बन गई।
 शब्द की एक लड़ी जो रखी सामने ,
हो विदित आपको यह कला साधिके,
 आपके पग बंधे थे तो पायल रही,
 मेरे होठों पर आई गजल बन गई।
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भीड़ भीड़ बस भीड़ हर तरफ चेहरा कोई नहीं है 
हर पल है गतिमान निरंतर ठहरा कोई नहीं है ।
सिसके मानव की मानवता ,खड़ी बगल में पथ के, 
सुनता नहीं कोई भी सिसकी, बहरा कोई नहीं है।
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मेरी ख़ामोशी में भी फसाना ढूंढ लेती है 
बड़ी शातिर है ये  दुनिया बहाना ढूंढ लेती है ।
हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने का
 मगर आंख फिर भी सपना सुहाना ढूंढ लेती है ।
ना चिड़िया की कमाई है ,ना कारोबार है, कोई,
 वह केवल हौसलों से आाबोदाना ढूंढ लेती है ।
समझ पाई न दुनिया मस्त हल मंसूर का अब तक,
 जो सूली पर भी हंसना मुस्कुराना ढूंढ लेती है ।
उठाती है जो खतरा हर कदम पर डूब जाने का ,
वही कोशिश समंदर में खजाना ढूंढ लेती है।/
अपने साए से भी अश्कों को छुपा कर रोना जब भी रोना तो चिरागों को बूझकर रोना हाथ भी जाते हुए वह तो मिलकर ना गया मैंने चाहा था जिसे सीने से लगाकर रोना तेरे दीवाने का भी क्या हाल किया है हमने मुस्कुराते हुए लोगों को भी जाकर रोना लोग पढ़ लेते हैं चेहरे पर लिखी तब लिखें इतना दुश्वार है लोगों से छुपा कर रोना

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