होता नहीं है फैसला सिक्का उछाल के,
ये दिल का मामला है, जरा देख भाल के ।
मोबाइल के दौर के आशिकों को क्या पता,
खत में रख देते थे, दिल निकाल के ।
अपनी बात------------------- अमरीका में रहते कुछ काम नहीं था । पढ़ने का समय खूब था । खूब पढ़ा । कुछ रचनाए बहुत पसंद आई । डायरी कितनी बनाता । इसलियें ये ब्लॉग बना दिया । इसमे मुझे जहाँ से जो पसंद आया लिया और जिसने फेस बुक पर या कहीं और पोस्ट किया था , डाल दिया । डालने वाले का नाम भी दिया |ये सिलसिला आज भी जारी है।